chapter 3, bhagavad gita slokas / हिंदी में / hindimebook

 

bhagavad gita slokas
bhagavad gita slokas



नमस्कार आप को स्वागत है hindimebook.com और भगवद गीता के ब्लॉग सीरिज में

हम आप के लिए bhagavad gita slokas के सभी अध्धय के सभी श्लोक को  hindi में समझाने की कोचिस कर रहे है bhagavad gita slokas के किस श्लोक में क्या कहा गया है

 

इसके बारे में बताने की पूरी कोचिस करते है

 bhagavad gita हिन्दू धर्म के महान ग्रंथो में से एक है हन्दू धर्म में भगवद गीता को सबसे बड़ा ग्रन्थ भी मन जाता है

 

bhagavad gita  में दुनिया की सभी सुख बौर दुखो का वर्णन किया गया है

 

और अब हम bhagavad gita slokas के अध्धाय 3 के श्लोक 1 से श्लोक 20 तक इस पोस्ट में जाने गे

 

bhagavad gita slokas
bhagavad gita slokas


Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 1 में क्या कहा गया है  

3.01

अर्जुन पूछते हैं है जनाधन का यदि आपको कर्म के मुकाबले ज्ञान बेहतर लगता है तो फिर से केशव मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं

 

कृष्ण जान को कर्म से अधिक बेहतर बताते हैं तो हालत में यह सवाल उचित बनता है कि वह अर्जुन को कम करने के लिए मतलब युद्ध करने के लिए क्यों कह रहे हैं

 

क्योंकि अगर ज्ञान की ही बात है तो वह तो अर्जुन कृष्ण से ले ही रहे तो अपनों को मारने के ऐसे भयंकर युद्ध में उन्हें क्यों लगा रहे हैं दोस्तों हमारे मन में ऐसे आते हैं आखिर क्यों करना

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 2 में क्या कहा गया है

3.02

 

कृष्ण की बात सुनकर अर्जुन की बुद्धि मोहित हो रही थी समझने के बजाय वह और ज्यादा उलझ रहा इसलिए अर्जुन कष्ट से कहता है

 

एक बात बताइए प्रभु जिससे मेरी उलझन दूर हो सके अर्जुन कहना चाहते हैं कि भगवान कंफ्यूज मत करिए मेरी दुविधा को दूर करके कोई एक बात बताइए जिस पर मैं चल सके कृष्ण ने जो बातें बताई वह गुण है कॉम्प्लिकेटेड कह रही है

 

ऊपर से देख कर ऐसा लगता है यह तो बस ज्ञान की बातें हैं इन पर चले तो चले कैसे यही दुविधा अर्जुन की भी है और कृष्ण उत्तर दे रहे हैं

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 3 में क्या कहा गया है

3.03

 श्री भगवान अर्जुन से कहते हैं कि इस दुनिया में दो प्रकार की निष्ठा दो प्रकार के विश्वास एक तो है सांग सहयोग जिसका रिश्ता ज्ञान से है

 

और दूसरा है कर्मयोग जिसका के लेना देना सिर्फ कर्म से निष्ठा का अर्थ है कुछ भी करने की सबसे परिपक्व अवस्था पराकाष्ठा अपनी इंद्रियों को वश में कर परमात्मा में ध्यान लगाना ज्ञान योग से होता है और इसको कहते हैं

 

संन्यास या सांसदों और दूसरा होता है कर्म योग मतलब निष्काम कर्म करके फल में आ सकती ना रखना

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 5 में 

क्या कहा गया है

3.05

ऐसा हो ही नहीं सकता कि मनुष्य किसी भी काल में मात्र भी बिना कर्म किए रह जाए हमारी दुनिया ऐसी है

हम चाहे या ना चाहे कर्म तो हमें करना ही पड़ेगा कर्म न करना भी कर्म करना ही है जिस तरह हम इस दुनिया में आए हैं

जिस तरह से प्रकृति ने हमें में नेचर हमें बनाया है उसका गुण यही है कि हम हर समय कर्म करें प्रकृति में कभी कुछ रुकता नहीं चाहते चलती हैं समय चलता है जीवन का चक्का चलता ही रहता है

जब तक जीवन रहेगा तो कर्म ही रहेगा इसी लिए यह आवश्यक है कि कर्म को समझा जाए और समझ के उसे किया जाए

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 6 में क्या कहा गया है

3.06

 

जो सिर्फ दिखावे के लिए अपनी इंद्रियों को जबरदस्ती ऊपर से रोककर लेकिन अंदर मन से हमेशा उन्हीं के बारे में सोचता है

 

वह मिथयचारी अर्थात दम भी कहा जाता है मतलब झूठ और घमंडी खाना खाने से तो मना कर दिया लेकिन हमेशा खाने और उसके स्वाद के बारे में ही सोचता रहे तो यह कैसा उपवास व्रत नहीं माना जाएगा कितने ही साधु सन्यासी आपको मिलेंगे जो कहते हैं

 

कि उन्होंने दुनिया को त्याग दिया है कर्म को त्याग दिया है लेकिन अगर उनके मन में इस दुनिया के लिए अभी भी लालसा है इच्छा है तो कृष्ण उन्हें और पाखंडी बताते हैं

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 7 में 

क्या कहा गया है

3.07

हे अर्जुन जो पुरुष सच्चे मन से इंद्रियों को कंट्रोल में कर उनसे बिना लगाम लगाए काम करता है वही कर्म योग का पालन करता है वही श्रेष्ठ है कृष्ण एक तरह से चेतावनी दे रहे हैं 

इंद्रियों  को वश में तो करना ही है परंतु साथ ही साथ मन का ऑन इंद्रियों से किसी भी विषय से लगाव नहीं होना चाहिए उसे ही कर्म योग माना जाएगा जब इंद्रियां वश में होती हैं 

तो आप कुछ भी करने में संभव होते हैं किसी भी तरह की कोई बाधा डिस्टरबेंस आपको आपके काम से रोक नहीं सकती और अगर आप इंद्रियों के बस में है 

तो चाहे वह स्वादिष्ट खाने की महक ही क्यों ना हो कोई नारी ही क्यों ना हो आसपास का चोर ही क्यों ना हो छोटी या बड़ी बाधा आपको आपका काम करने से रुकेगी

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 8 में 

क्या कहा गया है

3.08

हे अर्जुन तू केवल कर्तव्य निभा क्योंकि कर्म न करने के मुकाबले कर्म करना बेहतर है तथा कर्म न करने से तेरा जिंदा रहना भी तो पॉसिबल नहीं अर्थशास्त्र उठा और युद्ध कर अपना कर्म का क्योंकि यह कर्म करने से कहीं अच्छा है कहने का अर्थ है कि कर्म तो बहुत सारे हैं 

लेकिन उसमें से एक चुनाव हुआ है उस चुने हुए को ही निर्धारित कर्म कहते हैं अपनी मर्जी से अगर आप कर्म सुन लेंगे तो उसे निर्धारित नहीं माना जाएगा 

आपको अपना कर्तव्य समझकर अपना कर्म चुनना होगा अथवा जो कर्म आपको मिला है उसे अपना कर्तव्य समझकर निभाना होगा

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 9 में 

क्या कहा गया है

3.09

इस लोक में कृष्ण पूरे समाज की भलाई वाले कर्म को समझा रहे हैं यज्ञ वह होता है जिसमें सब शामिल होते हैं कृष्ण कहते हैं 

यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्मों से ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बनता है इसलिए हे अर्जुन तो इच्छाओं को छोड़ कर उस यज्ञ के लिए ही भली भांति कर्तव्य कर्म का अर्थात समाज और प्रजा की भलाई के लिए किया गया 

निस्वार्थ काम हमको भी अपने कर्तव्यों को यज्ञ समझ ऐसे कामों में अपना योगदान देना चाहिए जिससे समाज का भला अगर हम सब अपने काम को यज्ञ समझ उसे सम्मान पूर्वक करें तो सबका भला होगा ऐसे ही आप निर्धारित करनी है

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 10 में 

क्या कहा गया है

3.10

प्रजापति ब्रह्मा ने इस दुनिया की शुरुआत में यज्ञ को रखकर अपनी जनता से कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को शिक्षित हो प्रदान करेगा घरों में जो यज्ञ किए जाते हैं 

उन्हें एक धार्मिक कर्मकांड न समझ कर उसकी इंपॉर्टेंट समझनी चाहिए यज्ञ हमारे संस्कारों का एक संगठित रूप है 

संस्कार मतलब काम करने का सबसे उत्तम तरीका हम हर विधि को संस्कार को एकदम उचित तरीके से पूरा कर अपने कर्म को शुरू करते हैं यज्ञ एक तरीके से हमें रास्ता दिखाता है अगर आगे भी संस्कारों का पालन होगा तो दे अर्थात गोल हमारा जरुर पूरा होगा

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 11 में क्या कहा गया है

3.11

ब्रह्मा कहते हैं कि यज्ञ से सब लोगों को देवताओं को खुश करना चाहिए और फिर वह देवता खुश हो के हम सबकी भलाई करेंगे 

इस प्रकार निस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे यह तरीका है देवताओं को खुश करने का और उसके बदले में देवता आप को खुश रखते हैं 

आपकी उन्नति करते हैं इसलिए काम शुरू करने से पहले कुछ भी चुप करने से पहले ईश्वर का नाम लेने का विधान है 

यही ईश्वर का नाम जब सही तरीका सही पद्धति सही मैसेज के साथ किया जाता है उसे यज्ञ  कहते हैं यज्ञ और देवताओं के बीच में दोनों के बीच संबंध बना रहता हैं

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 12 में 

क्या कहा गया है

3.12

यज्ञ करके जब आप देवताओं की पूजा करते हैं तो वह आपके बिना मांगे ही आपकी तारीफ ताऊ को पूरा कर देते हैं 

लेकिन जो यज्ञ नहीं करता उस यज्ञ से देवताओं को प्रणाम नहीं करता लेकिन फिर भी अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहता है उन्हें चोर समझना चाहिए कुछ देने पर कुछ मिलता है 

कुछ करने से कुछ मिलता है बिना कुछ चढ़ाए बिना पूजा किए अगर कोई चाहता है कि उसकी मनोकामना पूरी हो जाए बिना कुछ काम कि अगर कोई सोचे कि उसका काम बन जाए तो इसे बेईमानी या चोरी ही तो कहा जाएगा

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Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 13 में 

क्या कहा गया है

3.13

यज्ञ से बचे हुए अन्य को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्य पकाते हैं मैं तो बाप को ही खाते हैं 

हम क्या सिर्फ खाकर जिंदा रहने और फिर मर जाने के लिए पैदा होते हैं ऐसे जीवन का क्या मतलब हुआ अपने जीवन का पर्व पर उसका उद्देश्य हमें समझना चाहिए इस ब्रम्हांड में हम क्यों हैं 

जो हमें ईश्वर या मोक्ष को प्राप्त करना है इन सब को समझने के लिए ही यज्ञ जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं जो लोग यज्ञ ईश्वर को याद किए बिना सिर्फ अपने जिंदा रहने में ही लगे रहते हैं उन्हें चोर समझना चाहिए

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 14,15, में क्या कहा गया है

3.14,15

अगर अन्य खत्म हो जाए तो सब खत्म हो जाएंगे संपूर्ण प्राणी जगत हर कोई अन्य से उत्पन्न होते हैं अन्य की उत्पत्ति दृष्टि से होती है या नीचे बारिश और बारिश यज्ञ से होती है 

और यज्ञ कर्मों से होते हैं और कर्म की उत्पत्ति वेद हमारी संस्कृति का सारा ज्ञान  वेद से ही तो आया है कर्म क्या है उसकी परिभाषा भी वेद से आई है और वेद परमपिता परमात्मा से खुद बंद हुए हैं 

वेद ईश्वर से आया ज्ञान है वेद से आगे और वेद से बड़ा कुछ भी नहीं इसे दोस्तों यह सिद्ध होता है कि यज्ञ और ईश्वर में सीधा संबंध है


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Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 16 में 

क्या कहा गया है

3.16

कृष्ण कह रहे हैं हे पार्थ जो पुरुष परंपरा से नहीं चलता जो सृष्टि चक्र प्रकृति के नियमों का पालन नहीं करता मतलब जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता 

वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में भरमण करने वाला पापा युगपुरुष व्यर्थ ही जीता है ऐसा पुरुष ऐसा इंसान बस इंद्रियों के वश में होकर के जिंदा रहता है जीता है और मर जाता है 

उसके जीवन मृत्यु का चक्कर चलता ही रहता है चलता ही रहता है ऐसे इंसान को जीने और मरने का कोई मतलब नहीं वेदों में ग्रंथों में जो ज्ञान जो नियम बनाए हैं 

उनका मतलब और उस मतलब के अनुसार हमको अपना जीवन जीना चाहिए

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 17 में क्या कहा गया है

3.17

क्रिकेट कहते हैं जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही सिर्फ तथा आत्मा में ही संतुष्ट को उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है 

आत्मा का मतलब यह सबसे बड़ा सच है और जो सत्य को समझता है सत्य में ही खुश हो के सत्य में ही रहता है उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं जिसको ज्ञान प्राप्त हो चुका है 

जो जीवन की सच्चाई जान चुका है सिर्फ वो ही ऐसा है जिसके लिए कर्तव्य का कोई मतलब नहीं लेकिन ऐसा कोई लाखों-करोड़ों में ही एक होता है बाकी हम सब के लिए कर्तव्य ही सब कुछ है

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 18 में 

क्या कहा गया है

3.18

संजय श्री कृष्ण की ज्ञान को हमें आगे बता रहे हैं के ऐसे महापुरुष जो आत्मा को सच को जान चुके हैं 

उनके लिए कर्म करने का कोई प्रयोजन रहता ही नहीं ऐसे महापुरुष कर्म के बंधन से छूट चुके हैं क्योंकि यह ज्ञानी इस दुनिया और उस ईश्वर को समझ चुके हैं 

इनका बात से कोई मतलब नहीं रहता इसलिए यह महा पुरुष हमारे जैसे लोगों से एकदम अलग है इन पर वह नियम लागू नहीं होता जो हमारे जैसे दुनियादारी में लगे हुए लोगों पर लागू होते हैं 

दोस्तों इसे कुछ ऐसे समझ गए कि जैसे ईश्वर मिल गया हो उसे फिर और क्या चाहिए वह फिर कोई और कर्म क्यों करें

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के श्लोक 19 में 

क्या कहा गया है

3.19

हे अर्जुन इसलिए तू लगातार आ सकती अपनी इच्छा को छोड़कर हमेशा अपने कर्तव्य कर्म को ठीक तरीके से करता रहे अपनी इच्छाओं को अपनी कामनाओं को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ कर्तव्य को पूरा करने में लग जा 


क्योंकि आसक्ति से लगाओ से छूटकर जो भी अपना कर्म करता है वह मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है कर्तव्य का रास्ता आसान नहीं होता कितनी ही बार हम सब को लगता है 

कि सब कुछ छोड़ कर आराम करें देर तक सोए या मेहनत ना करें लेकिन उससे कभी कुछ भी हासिल नहीं होता ऐसा श्री कृष्ण समझा रहे हैं

 

Bhagavad Gita के अध्धाय 3 के  bhagavad 

gita slokas 20 में क्या कहा गया है

3.20

बहुत से ऐसे लोग हैं जो कर्म करते हुए ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे बहुत से ज्ञानी महापुरुष तो ऐसे होते हैं जो आत्मा की सच्चाई को पहचान जाते हैं 

लेकिन बाकी लोगों के लिए कर्म ही एक रास्ता है अगर उन्हें जीवन में कुछ करना है तो अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन का कोई मतलब हो जन्म लेना जिंदा रहना और फिर मर जा इस बेकार जीवन से बचकर अगर आप कुछ करना चाहते हैं 

तो आ सकती यानी अटैचमेंट से बचते हुए आपको अपना कर्म करना चाहिए और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए

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