Bhagwat geeta saar hindi । अध्धाय 2.31-2.45 । गीता सार, हिंदी में । hindimebook

bhagwat geeta saar hindi
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( bhagwat geeta saar hindi )

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 31 में क्या बताया गया है

31.  

कृष्ण अर्जुन को याद दिलाते हैं कि अपने धर्म को देख कर भी भय करने योग्य नहीं है अर्थात तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है 

दोस्तों कृष्ण कहते हैं कि अगर हमने किसी काम को करने का निर्णय ले लिया है तो फिर उस से डरना नहीं चाहिए पूरे तन मन से बस उस काम को उस ज्ञान यह है कि निर्णय के बाद डरने का कोई मतलब नहीं सिर्फ करने का मतलब है कर्म करने का ( bhagwat geeta saar hindi )

 

भगवद गीता  के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 32 में क्या बताया गया है

32.

हे पाथ अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं युद्ध को चैलेंज को खुले मन से स्वीकार करने में ही सबसे बड़ी खुशी है 

दोस्तों खुला हुआ द्वार भी अपने जीवन में अगर कोई चुनौती मिलती है तो उसे मोक्ष मानकर उस चैलेंज को पूरा कर जाने में लग जाना चाहिए सत्रीय वह है जो युद्ध में अपना धर्म निभाएं अगर आप की कामना आपका प्रयास आपके लिए गिफ्ट है तो एक सत्र की तरह आपको भी अपने धर्म को पूरा करना चाहिए   shrimad bhagwat geeta


भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 33 में क्या बताया गया है

33.

किंतु यदि तो इस धर्म युद्ध युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा कृष्ण चेतावनी देते हैं कि 

अगर हमने चैलेंज को युद्ध को स्वीकार नहीं किया तो फिर उसके बदले में आप मिलेगा हमारा स्वभाव हम में युद्ध करने की क्षमता शक्ति को पैदा करता है और अगर हमारा स्वभाव हमें युद्ध से दूर ले कर जा रहा है तो मतलब हम अपने धर्म से दूर हो रहे हैं और पाप के भागी हो रहे हैं ( bhagwat geeta saar hindi )


भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 35 में क्या बताया गया है

35.

 

अर्जुन जिन की दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा वही महारथी तो जय भाई के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे 

दोस्तों अर्जुन तो सब महान योद्धा समझते थे अगर अर्जुन युद्ध से हट जाता तो वह उसे कायर मानते हैं चाहे अर्जुन को यह युद्ध ना करने में बहुत अपमान होता है अच्छा या बुरा छोटा या महान तुलना का खेल है दोस्तों इस खेल में हार जीत तो होती है इसके अलावा युद्ध से ही मुंह फेर ले तो समाज में उसे कहीं जगह नहीं मिलती

 

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 37 में क्या बताया गया है

37.

 

या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगे गा इस कारण से अर्जुन को युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा आज की दुनिया में इसी बात को सोचकर देखिए 

दोस्तों पूरे जी-जान से खेलने पर आप हार जीत की चिंता नहीं करते क्योंकि आप अपना सब कुछ झोंक चुके होते हैं जितने पर नाम होता है और हारने पर भी आप अपने और दूसरों के मन में सम्मान पाते हैं क्योंकि आपने धर्म के अनुसार युद्ध किया इसलिए अपनी चुनौतियों से चलने से कभी भी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए ( bhagwat geeta saar hindi )

 

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 38 में क्या बताया गया है

38.

 जय पराजय लाभ हानि और सुख दुख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा इस प्रकार युद्ध करने से अर्जुन धूप आपको नहीं प्राप्त होगा 

दोस्तों अपनी चुनौती में अगर आप अपना सर्वस्व लगा देते हैं तो जीतने पर तो सब कुछ मिलेगा ही लेकिन अगर हार भी जाते हैं तो अफसोस नहीं होगा निराशा नहीं होगी क्योंकि आपके पास जो भी था वह आपने युद्ध में अपनी चैलेंज में लगा दिया अब इस स्थिति को बड़े ध्यान से देखिए यह जो मैं अपना सब कुछ लगाने पर हार-जीत में अंतर कम हो जाता है और यही तो कृष्ण भी कह रहे हैं कि सुख और दुख को एक जैसा समझे और बस युद्ध में लग जाएं अच्छा बुरा सब को एक जैसा समझ कर बस अपने गांव अपनी चुनौती में लग जाए

 

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 39 में क्या बताया गया है

39.

हे पाथ यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञान योग के विषय में कही गई है और अब तो इसको कर्म योग के विषय में शोध 

दोस्तों अब कृष्ण कर्म योग के बारे में बता रहे हैं जिससे कर्मों के बंधन को तोड़ा जा सके नष्ट किया जा सके ज्ञान सोचने और समझने की बात है और कर्म व्यवहारिक ज्ञान ए प्रैक्टिकल सच्चाई दोनों तरीके हैं अपने गंतव्य मंजिल यादें स्टेशन पर पहुंचने के


भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 40 में क्या बताया गया है

40.

इस कर्म योग में आरंभ का अर्थात बीच का नाश नहीं है और उल्टा फल रूपी दोस्त भी नहीं है बल्कि इस कर्म योग रूपी धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु रूपी महान भाई से रक्षा करवा देता है सबके लिए ज्ञान का साधना का साधु का मार्ग संभव नहीं है हमारे जैसे अधिकतर लोगों को कर्म योग अपनाना चाहिए अगर कर्म योग को समझ के उस पर हम सब चल सके तो कभी निराशा नहीं होगी अगर इस कर्म योग का हम थोड़ा सा भी समझ ले तो जन्म और मृत्यु के डर से हमेशा के लिए बच सकते हैं ( bhagwat geeta saar hindi )

 

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 41 में क्या बताया गया है

41.

हे अर्जुन इस कर्म योग में निश्चय आदमी का बुद्धि एक ही होती है किंतु अच्छे विचार वाले विवेक हिंसक आम मनुष्यों की विधियां निश्चय ही बहुत ढेरों वाली और अनंत होती है जब फैसला लेना हो तो बुद्धि एक ही होती है लेकिन जहां सोच कि फैसले की निर्णय की कमी हो वहां कई बुद्ध काम करती है यह निर्णय खेती के बारे में कहा गया है 

दोस्तों जब आप फैसला नहीं ले पाते हैं कोई डिसीजन नहीं ले पाते हैं तो न जाने कितनी ही दिशाओं में आपका ध्यान आपकी बुद्धि जाती है लेकिन अगर आप निर्णय करने की सोच ले तो उसके बाद सिर्फ उस काम को करने का ही प्रण होता है और अगर ऐसा नहीं है तो ऐसा होना चाहिए

 

भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 42 में क्या बताया गया है

42.

हे अर्जुन जो भोगो में तन्मय हो रहे हैं जो कर्म फल के प्रशंसक वेद वाक्यों में ही प्रीति रखते हैं जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्त वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं देखते या नहीं ऐसे लोग जो कर्म के बदले में होने वाले सिर्फ फल लाभ की ही बात करते हैं जब भी कोई काम उससे होने वाले फायदे से शुरू होता है तो वह काम नहीं स्वार्थ हो जाता है उसे कर नहीं कह सकते जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें कृष्ण कर्म फल का प्रशंसक बता रहे हैं आप गर्मी होने से बचीये

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भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 43 में क्या बताया गया है

43.

ऐसे लोगों को पृष्ठ होगी बताते हैं वह कहते हैं हे अर्जुन ऐसा कहने वाले हैं वे अविवेकी जन इस प्रकार की जिस पोस्ट पर अर्थात दिखाओ शोभा युक्त पानी को कहा करते हैं ऐसे लोग भी होते हैं यानी वह लोग जो कर्म की बात सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि उन्हें बदले में भोग और ऐश्वर्य जैसे फल या लाभ मिल सके काम से ज्यादा उसके होने वाले फायदे की बात करना तो उन्हें कई लोग आपको मिलेंगे जो जमीन पर इतना काम नहीं करेंगे जितना वह हवाई किले बनाएंगे दोस्तों ऐसे ढोंगी लोगों से बचना चाहिए


भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 44 में क्या बताया गया है

44.

जो कर्म की बातें सिर्फ भुवनेश्वरी के लिए करते हैं जिनका देंगे फिर भोग और ऐश्वर्य है उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चय आदमी का बुद्धि नहीं होती या ने ऐसे लोगों का धैर्य स्वार्थ होता है फायदा होता है भगवान या अपने काम में सच्ची लगन नहीं होती ऐसे लोगों की संगत से बचना चाहिए इनकी पहचान होती है इनके नेगेटिव रवैया से इनकी बातों से आप समझ जाएंगे इस काम में उनकी कोई रुचि नहीं बस उस काम का फल भोगने में इनको बहुत रुचि है

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भगवद गीता के अध्धाय 2 के श्लोक नंबर 45 में क्या बताया गया है

45.

हे अर्जुन वेदों के कर्मकांड हमारी प्रकृति के नियमों से जुड़े इसलिए उन लोगों एवं उनके साधनों में आ सकती ही हर्ष दों का दीप बंधुओं से रहित नित्य वस्तु परमात्मा में स्थिति योग और खेलकूद ना चाहने वाला और स्वाधीन अंतर करण वाला यहां पर कृष्ण अत्यंत कठिन लेकिन सबसे बड़ी बात कह रहे हैं वह कहते हैं कि वेद भी सिर्फ तीन गुणों में ही सीमित हो जाते हैं उससे आगे वह भी नहीं जानते उससे आगे हैं कर्मियों उनका कहना है कि कर्म करो लेकिन उसमें आ सकती नहीं उससे जुड़े सुख दुख से लगाओ ना रखो ( bhagwat geeta saar hindi )


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