bhagwat Geeta हिंदी में I सम्पूर्ण shrimad bhagwat geeta I geeta hindi

Geeta hindi

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भगवत गीता (geeta hindi) हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा ग्रन्थ है भगवत गीता में सभी सवालो का उत्तर मिल जाता है भगवत गीता महँ ग्रंथो में से एक है

 

भगवत गीता गीता सार चैप्टर वन नमस्कार दोस्तों भगवत गीता (geeta hindi) और भगवत गीता के ज्ञान पर असंख्य लोगों ने काम किया है जाने कितनी ही गीत आपने सुनी भी होगी 

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परंतु मैं Vijay hindimebook के तरफ से अब आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं भगवत गीता (geeta hindi) की एक और व्याख्या क्या विशेष है इस गीता में गीता में अगर कुछ विशेष हैं तो वह हैं श्रीकृष्ण बाकी हम सब अपने मित्र हैं साधन है लेकिन यह मेरा पास प्रयास है 


कि हमारे यहां आज के जमाने में यह ग्रंथ हमें रास्ता दिखाएं आसानी से गीता को हम सब समझ पाए और अपने रोजमर्रा के जीवन में इसका उपयोग कर पाए वैसे गीता के बारे में बहुत कुछ कहा गया है सुना गया है अभी कोई ऐसा धर्म चंद होगा इस पर इतना लिखा गया ऐसा क्या खास है गीता में किस समय समय पर यह और भी आवश्यक और मार्गदर्शक भी होती जा रही है 


एकदम साधारण भाषा में अगर कहे तो भगवत गीता उत्तर है जीता एक उत्तर हे दुनिया के हर प्रश्न का जीवन से जुड़ा ऐसा कोई प्रश्न नहीं जिसका के उत्तर श्री कृष्ण भगवत गीता में नहीं देते हमारे मन मस्तिष्क में कोई भी शंका परेशानी चिंता किसी भी तरह का आवेश किसी भी तरह की दुविधा हो दुनिया के हर धर्म संकट हर डायल का उत्तर है 

 

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भगवत गीता (geeta hindi) में 18 अध्याय में वेदों और उपनिषदों का सार है अरे भाई इसे आप बेदाग उपनिषद समझ करके जाइएगा मत सोचिए कि यह हमारी और आपकी समझ से दूर है इसके हर अध्याय हर्ष लोक में आप अपने आप को अर्जुन समझिए 


क्योंकि अर्जुन की हर क्षण का उसका हर डर हर समस्या वैसे देखा जाए तो हमारी ही परेशानी है और हर परेशानी का हल बता रहे हैं श्री कृष्ण कृष्ण को सिर्फ अर्जुन के सारथी मत मानिए गा उन्हें अपने जीवन का सारथी भी मांगेगा उनके कहे अनुसार अगर हम और आप चलेंगे तो मैं दावे के साथ कहता हूं 


कि हम सारी परेशानियों को आसानी से पार कर जाएंगे ज्ञान या धर्म ग्रंथ की बड़ी-बड़ी बातें मेरे साथ नहीं होगी दोस्तों यहां पर जीवन की प्रैक्टिकल सच्चाई हो और प्रैक्टिकल प्रॉब्लम की बात की जाए तो आइए  bhagavad gita in hindi


मैं Vijay 18 अध्यायों के सफर

 

अध्याय 1 अर्जुन विषाद योग पहला अध्याय हैं अर्जुन विषाद योग यह शुरुआत होती है धृतराष्ट्र के सवालों से कुछ जानना चाहते हैं

 कि युद्ध में क्या हो रहा है उनका पुत्र दुर्योधन और उनकी सेना क्या कर रही है और साथ ही में पांडु पुत्रों की सेना क्या कर रही है 

उसके बाद दोनों सेनाओं के सुर वीरों का वर्णन और उसके बाद आता है अर्जुन का कैसा मतलब कि उनका दुख उनकी समस्या उनका धर्म संकट आइए सुनते हैं अर्जुन विषाद योग

 

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1.

धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं धर्म भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्र क्या कर रहे हैं धृतराष्ट्र जानना चाहते हैं कि युद्ध स्थल पर आखिर हो क्या रहा है धृतराष्ट्र अंधे थे 

देख नहीं सकते थे लेकिन आंखों से अंधे थे मन और मस्तिष्क से नहीं उन्हें पता था कि वह धर्म के साथ नहीं क्योंकि धर्म तो वहां होता है 

जहां श्री कृष्ण थे अपने पुत्र मोह में उन्होंने शांति की जगह युद्ध को चुना था लेकिन वह जानते थे कि इस युद्ध को जीतना आसान नहीं होगा अपने जीवन में जब हम कुछ गलत करते हैं तो हम भी समझ रहे होते हैं 

दोस्तों कि हमारे कीर का नतीजा शायद अच्छा ना हो और ऐसा ही रित राष्ट्र के साथ भी हुआ वह भी इसी तरह किसी आशंका में लिखते हैं

 

अध्याय 1 श्लोक नंबर 2 में क्या कहा गया है

 2.

संजय आंखों देखा हाल बताते हुए उत्तर देते हैं हे राजन दुर्योधन पांडवों की सेना के वीर को देख रहे हैं और यह बात गुरु द्रोणाचार्य को जाकर के कहते हैं संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी 

वह युद्ध से दूर होते हुए भी युद्ध को देख सकते थे वह जो देख रहे थे वही बता रहे थे इसमें वह अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कह रहे थे सिर्फ आंखों देखा हाल बता रहे थे 

युद्ध का याने जैसे हम लोग रनिंग कमेंट्री सुनते हैं बस इसी तरह समझ लीजिए यह उन्हीं के दिव्य दृष्टि डिवाइन विजन का कमाल था कि हमें सुनने को मिली 

 

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3.

आचार्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न आपका ही बुद्धिमान शिष्य है पांडु पुत्रों की यह बड़ी भारी सेना की युवा का रचना धृष्टद्युम्न ने ही की है 

यह कार्य चना का मतलब हुआ कि किस विशेष तरीके से सेना के योद्धा खड़े हैं एक ऐसा भी जिससे उस सेना के बीच घोषणा संभव हो और अगर कोई उस में घुसने में सफल भी हो जाता है 

तो कभी बाहर ना आ सके दोस्तों जब शत्रु या समस्या को हम देखते हैं तो वह हमें बहुत बड़ी और विकराल दिखाई देती और मन में यह डर भी रहता है कि कुछ कर गुजर के अगर हम इसमें खुशी गए तो क्या होगा 

9-क्या हम बाहर आ पाएंगे कि हम जीत पाएंगे ऐसी ही सोच से दुर्योधन भी गुजर रहा है


4.

इन तीन श्लोक में दुर्योधन पांडव पुत्रों की सेना के महान योद्धाओं का नाम ले रहा है जब भी युद्ध होता है तो आप अपने सामने खड़ी थे ना उस सेना के योद्धाओं को जांच कर सकते हैं 

वैसे ही दुर्योधन भी कर रहा है दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है बड़े-बड़े धनुष वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सत्य की और मेरा तथा महारथी राजा द्रुपद ऋषिकेश और पाकिस्तान तथा बलवान काशीराज पुरुष और मनुष्यों में श्रेष्ठ पराक्रमी योद्धा तथा बलवान उत्तम आजा चंद्र पुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र सभी भारतीय पता चलता है 

उसके बारे में सब कुछ जानना चाहिए दोस्तों से हमें होना चाहिए उसके बारे में मालूम होना चाहिए जैसा कि दुर्योधन भी कर रहे हैं


6. 

दुर्योधन नागे कहता है ए ब्राह्मण से पांडवों की सेना के योद्धाओं को तो आपने देख लिया अब अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं 

उनको भी तो आप समझ लीजिए द्रोणाचार्य की जानकारी के लिए शत्रु की सेना के बाद दुर्योधन अपनी सेना के जो जो सेनापति हैं उनके बारे में बतलाता है 

समस्या के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद बारी आती है अपने पक्ष में सोचने की यह जानना होता है दोस्तों के आपके पास क्या-क्या स्ट्रांग पॉइंट है आप किन बातों में मजबूत है 

जिससे आप उस समस्या पर विजय पापा आएंगे जैसे आपने समस्या के हर पहलू के बारे में सोचा उसी तरह से आपको स्वयं का भी आकलन कर देना चाहिए


7.

सबसे पहले आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर और संग्राम विजई कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा के बारे में जानिए दोस्तों जिस तरह से हम आज के जमाने में ऐसे सेट करते हैं 

ना वैसे ही दुर्योधन भी अपने शत्रु की सेना को देखते हुए दोनों सेनाओं के योद्धा की बातें करते हुए आगे होने वाले युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं 

चुनौती को हर तरह से समझ कर ही उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है चुनौती को इतने अच्छे से ध्यान देना चाहिए कि जब हम उससे लड़ने जाएं तो कुछ नया न लगे कोई सरप्राइस ना आए युद्ध हो या चुनौती सरप्राइस आपको हरण सकता है


8.

दुर्योधन गर्व के साथ कहता है कि मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वालों की कमी नहीं इतना ही नहीं यह शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित है 

और सब के सब युद्ध में चतुर है दुर्योधन के एक इशारे पर उसकी सेना के शूरवीर लड़ने मरने को तैयार हैं उन्हीं को देख दुर्योधन खुश हो रहा है दुर्योधन के साथ युद्ध में लड़ने के लिए शूरवीर थे 

जो उसके लिए मरने को तैयार है आप जब अपने जीवन की चुनौती से लड़ते हैं तो आपके साथ कौन होता है आपके साथ होता है 

आपका हुनर आपकी हिम्मत आपकी मेहनत आपकी और आपके अपने रिश्तेदार जैसे शूरवीर दुर्योधन के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं वैसे ही यह आपके साथी भी आपके लिए कुछ भी कर सकते हैं 

 

9.

दुर्योधन आगे कहता है कि भीष्म पितामह द्वारा रक्षित उनकी सेना सब प्रकार से अजय है और वहीं क्षेत्र की सेना भीम द्वारा रचित दुर्योधन कहना चाहते हैं 

कि भीम की सेना को वह आसानी से जीत सकते हैं दुर्योधन यहां घमंड दिखा रहा है जो आपको बिल्कुल भी नहीं करना है तो उसको कभी नहीं क्योंकि अगर दुर्योधन जानता कि वह दूसरी सेना को हरा देगा तो फिर यूं ही 

क्यों करता युद्ध को जीतने के लिए दूसरे को हराना पड़ता है अगर चुनौतिया समस्या को देखकर हमें लगता है कि हम जीत जाएंगे तो विश्वास या आत्मविश्वास तो हो सकता है 

लेकिन घमंड नहीं क्योंकि अगर घमंड हुआ तो वह आपके हारने की शुरुआत है

 

10.

दोनों सेनाओं के इस तरह के वर्णन से दुर्योधन अपनी इस बात पर पहुंचना चाहता था और वह यह कि हर किसी को अपनी अपने मोर्चों पर अपनी अपनी जगह स्थित रहते हुए 

निस्संदेह भीष्म पितामह की रक्षा करनी है कहने का मतलब आप होने वाले युद्ध में सबसे अधिक उसकी रक्षा करते हैं जो आपके लिए युद्ध के लिए सबसे अधिक आवश्यक हो 

जैसे कि दुर्योधन और उसकी सेना के लिए भीष्म पितामह भीष्म पितामह के हारने का मतलब था कि युद्ध हार जाएं और उनके बच्चे रहने का मतलब कि आप सुधार नहीं सकते अपनी सबसे बहुमूल्य चीज को तब तक बचा के रखना चाहिए जब तक कि आप युद्ध पर विजय प्राप्त ना करें


11.

शंख उद्घोषणा होती है होने वाले युद्ध कौरवों में सबसे प्रिय सबसे बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उच्च स्वर में शेर की दहाड़ के समान गरज करें तक शंख बजाया कि 

दुर्योधन के ह्रदय में उत्पन्न हो गया युद्ध जीतने के लिए अपने पक्ष में माहौल बनाना पड़ता है खुद को दिलासा भी देना पड़ता है कि हम युद्ध जीतने में सक्षम ऐसा ही पितामह भीष्म ने किया और ऐसा ही हमें भी करना चाहिए (geeta hindi)


12.

युद्ध भयंकर होते हैं और यह इतिहास में आज तक के सबसे भयंकर युद्ध का आरंभ भीष्म पितामह कृष्ण अंत के पश्चात नगाड़े तथा ढोल मृदंग और नरसिंह है या दीपा जी एक साथ ही बचे थे 

इन बातों का नाम संगीतमय नहीं बहुत ही डरावना था युद्ध मनोरंजक नहीं होते दोस्तों इसलिए अगर युद्ध का फैसला ले लिया जाता है तो उसमें फिर जो भी स्वीकार कर लेना पड़ता है 

हर युद्ध हर चुनौती अपने देश के हालात लेकर आती है उन्हीं हालात के आधार पर ही हमें तैयारियां करनी पड़ती है

 

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13.

अब बारी थी पांडू पुत्रों की सेना के शंखनाद सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्री कृष्णा राधे देवी अपने अपने अलौकिक संत बजाएं युद्ध में जब तैयारी होती है 

तो दोनों तरफ से कोई हरबंस अपनी विजय की आशा में आज के समय में उसके लिए जाने के बारे में सोच सकता है हम कुछ भी ऐसा कर सकते हैं जो हमें मोटी दें या प्रोत्साहित करें

 

14.

श्री कृष्ण के शंख का नाम है पंचजन्य अर्जुन के देवगन और भयानक कर्म वाले भयानक भीमसेन ने अपना अकाउंट नामक महा शंख बजाए अपने जीवन में इसी तरह से हम भी 

अपने युद्ध अपनी चुनौती में आगे बढ़ने के लिए अपनी मोटिवेशन चुन सकते हैं कुछ लोगों के लिए संगीत ऐसा काम करता है कुछ के लिए भगवान को याद करना या कुछ के लिए माता-पिता का आशीर्वाद अपने आप स्वयं सुनिए और युद्ध के लिए तैयार हो जाए




15.

पांडवों में सबसे बड़े भाई कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंत विजय नाम का और नकुल तथा सहदेव ने शुभ हो और मणि पुष्पक नाम के शंख बजाए दोस्तों मोटिवेशन तो सबको चाहिए 

आपने देखा सभी लोग अपने अपने तरीके से युद्ध जीतने के लिए अपना अपना प्रयास कर रहे थे (geeta hindi)


16.

हर शख्स की अलग अनी अपना एक अलग अस्तित्व युद्ध का हर योद्धा अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है श्रेष्ठ अनुज वाले काशीराज और महारथी शिखंडी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजय असत्य की राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र और बड़ी भुजा वाले शब्द का पुत्र अभिमन्यु संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं 

श्री राजन सब ने अपनी ओर से अलग-अलग शंख बजाए दोस्तों महाभारत का युद्ध ऐसा था जिसमें हर बड़े से बड़े योद्धा भाग ले रहा था ऐसे विरले मौके को कोई कैसे छोड़ सकता था 

हमारे लिए ध्यान देने की बात यह है कि सच्चा योद्धा नंबर है जो युद्ध के लिए तत्पर रहें युद्ध को आप जीवन में चुनौती माने जो भी माने लेकिन उसके लिए हमेशा तैयार रहें इसलिए हर योद्धा शंख बजा बजा के सब को अपने होने का आभास करवा रहा है


17.

युद्ध से पहले जैसे आप शत्रु को अपनी शक्ति दिखा कर डराने का प्रयास करते हैं वैसे ही यहां भी हो रहा है संजय कहते हैं कि इस भयानक शब्द नहीं आ पार्षद पृथ्वी को भी भूल जाते हुए 

भारत राष्ट्रपति अर्थात आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर जवाब हुंकार भरते हैं और ट्राई देते हैं तो बड़े से बड़े शत्रु को भी डर लगता है यह ओंकार ऐसी होनी चाहिए कि शत्रु सोचे कि 

वह किस से युद्ध करने जा रहा है आप चाहे इंटरव्यू के लिए जाएं किसी से मिलने जाए आपका हुनर आपकी प्रतिभा ऐसी होनी चाहिए कि सामने वाला आपके कौशल से प्रभावित हो जाए


18.

अर्जुन अपने मोर्चा बांधकर कटे हुए धृतराष्ट्र संबंधियों को देखते हैं फिर अपना धनुष उठाकर ऋषिकेश श्री कृष्ण से कहते हैं मेरे रस को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए अर्थात अटल जो अपने स्थान से हटता नहीं 

जिसका नाश नहीं हो सकता श्री कृष्ण का एक नाम अक्षिता और अर्जुन अपने सारथी से दोनों सेनाओं के बीच में जाने को कह रहे हैं 

अर्जुन ने श्रीकृष्ण को इसलिए चुना था कि वह जानता था कि जब साक्षात भगवान उसके साथ हैं तो मतलब हम उसके साथ हैं जिसके साथ धर्म होता है वह कभी हार नहीं सकता (geeta hindi)


19.

आज के जीवन का युद्ध सबसे बड़ा ज्ञान है दोस्तों युद्ध कोई भी हो सकता है किसी भी प्रकार का पर्सनल यह बिजनेस से जुड़ा हुआ 

लेकिन दोनों पक्षों के बीच में जाकर आप युद्ध की तरह वस्था के बारे में जान सकते हैं अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हे कृष्ण जब तक मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लो इस युद्ध रूपी व्यापार में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है 

तब तक इस रथ को यहीं खड़ा रखें हमें भी दोस्तों हमें भी इसी तरह अपनी समस्या के बीच में खड़े हो उसे भली-भांति देखना और परखना चाहिए

 

20.

अर्जुन दुर्योधन को दुर्बुद्धि बता रहे हैं क्योंकि दुर्योधन के हट के चलते हुए ही जो युद्ध हुआ दुर्योधन का साथ देने जितने भी राजा आए हैं उन्हें अर्जुन युद्ध स्थल के बीच में खड़े हो करके देखना चाहते हैं दोस्तों यह जरूरी नहीं कि आपका शत्रु सही हो हो सकता है 


उसने गलत तरीका अपना कर के आप को युद्ध में उलझा ना चाहा हो जैसा के महाभारत में भी हुआ युद्ध तो करना ही पड़ता है और वह तभी करना चाहिए जब आप अपने शत्रु को अच्छे से देख चुके हैं जान चुके हैं 

इसलिए अर्जुन कृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच में रस को ले जाने के लिए कहता है

 

21.

संजय अपना आंखों देखा हाल बताते हैं हे धृतराष्ट्र जैसा कि आपने कहा था श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा संपूर्ण राजाओं के सामने रख को खड़ा करके इस प्रकार कहा है

 पहाड़ युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को दें और अर्जुन का ही नाम है दोस्तों उस अर्जुन का नाम है जो शंका मिलने की बात हम सब भी हो सकते हैं और अगर हम अपने आप को शंका में गिरा पाते हैं 

तो मदद करने के लिए कृष्ण भी दूर नहीं होते और ना ही उनकी गीता दूर होती है (geeta hindi)


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