श्री मद भगवत गीता अध्धाय 2 के श्लोक 46 से क्या कहा गया है ( gita in hindi ) -by hindimebook



gita in hindi
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भगवद गीता ( gita in hindi ) हिन्दू धर्म का सबसे पवित्र ग्रन्थ माना जाता है महाभारत काल में रचे गये इस ग्रन्थ को जीवन का सार माना जाता है गीता में 18 अध्धाय और 700 से ज्यादा श्लोक है गीता पूरणता: अर्जुन और उसके साथी श्री कृष्ण के बीच हुए संवाद पर आधारित पुस्तक है gita in hindi )

 

और इस पोस्ट में हम यह जाने गे की श्री कृष्ण अध्धाय 2 के श्लोक 46 से 58 तक क्या कहा है gita in hindi )

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 46 में क्या कहा गया है 

46.

बेहद बड़े जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है उसी तरह से अगर जिसने ब्रह्म तत्व को समझ लिया तब उसके लिए वेदों की कोई आवश्यकता नहीं होती 

 

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पोथी या बेद से ही आपको सफलता मिले ऐसा सोचना गलत है कर्म योग तो उस बड़े तालाब की तरह है कि अगर यह मिल गया तो छोटे तालाब की आवश्यकता आपको क्यों रहेगी कर्म का खेल इतना बड़ा है कि उसके आगे सारे ज्ञान छोटे पड़ जाते हैं लेकिन कर्म को समझना पड़ेगा कि आखिर यह होता क्या है gita in hindi )

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 47 में क्या कहा गया है

47.

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है उसके फलों में कभी नहीं इसलिए दुख कर्मों के फल के लिए काम मत कर और ऐसा भी ना हो कि तू कर्म ही ना करें कर्म करना है लेकिन फल के लिए नहीं गीता के सबसे लोकप्रिय श्लोक में इस श्लोक की गिनती होती है कर्म करना है लेकिन फल के लिए नहीं उसे अपना धर्म और अपना कर्तव्य समझकर

 

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 48 में क्या कहा गया है

48.

कृष्ण योग को और समझा रहे थे धनंजय तू आ सकती को त्याग कर सिद्धि और अतिथि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुए कर्तव्य कर्मों को कर कर्म के फल की इच्छा ना कर और ऐसा नहीं करना कि कर्म करने में इच्छा ना हो यही निष्काम कर्म की कुंजी उसकी चाबी उसका सार है कर्म के बाद क्या फल मिलेगा उसकी परवाह किए बिना बस पूरी लगन से अपने धर्म और कर्तव्य को पूरा कर gita in hindi )

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 49 में क्या कहा गया है

49.

कर्म के फल की इच्छा को छोड़कर जो निष्काम कर्म योगी होता है वह पाप पुण्य से दूर हो जाता है जो कल के लिए काम करते हैं उन्हें हमेशा असफल होने का डर रहता है और इसीलिए कभी भी बुक कर उनको अच्छे से नहीं कर पाते और फिर अगर उनको फल मिल भी जाता है तो इसी फल में उलझ जाते हैं इसलिए हमें बुद्धि योग की शरण में आना चाहिए लग्न सिर्फ काम में और भगवान में तब बुद्धि निश्चय से काम कर पाती है

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 50 में क्या कहा गया है

50.

बुद्धि योग की शरण में आने से बिना फल के काम करने वाला इसी दुनिया में पाप पुण्य से मुक्त हो जाता है हे अर्जुन तो समझ पर उपयोग में लग जा मतलब अच्छा हो बुरा हो सुख हो या दुख सभी में एक ही तरीके से संभव से तू बस अपना कर्म अपना कर्तव्य करता रहे

 


भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 51 में क्या कहा गया है

51.

 आम इंसान कर्म करके उसके फल को प्राप्त खुश होता है और उसके बाद दूसरे फल के लालच में फिर से नए घर में लग जाता है इसमें हल के बारे में सोचना ही प्रधान है और यह गलत बात है अगर आप अपनी सारी शक्ति क्षमता और इच्छा सिर्फ कर्म में लगाएं और अल्कोहल जाएं तो क्या होगा आपका ध्यान कर्म में रहेगा आप उस कर्म में बेहतर होंगे आपकी तरक्की होगी और रही बात हल्की तो सोच कर देखिए अगर आपने कर्म किया है तो आप फिर हल जाएगा कहां

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 52 में क्या कहा गया है

52.

कर्म के फल का मोह हो या रिश्तो का मोर धनि या ऐश्वर्य का मोर यही वो हमें बचाता है जब बुद्धि मोह के दलदल से निकल जाती है तब परमात्मा के पास आने की राह निकल आती है रिश्ते धन ऐश्वर्य उनसे मुंह बुरा है क्योंकि जब आपका लगाओ बिन वस्तुओं से हो जाता है तो सोचने की शक्ति कम हो जाती है बुद्धि ठीक से काम नहीं करती फैसले गलत हो जाते हैं इसलिए इस मोह को बुरा बताया गया है धृष्ट राष्ट के पुत्र मोह से ही पूरा महाभारत हुआ युधिष्ठिर के जुए के मुंह में उनका पूरा राज्य चला गया था दोस्तों यह उस समय की बात नहीं है आप चाहे तो आज के समय के भी कई सारे उदाहरण जो आप अपने आसपास में देख सकते हैं

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 53 में क्या कहा गया है

53.

जितने लोग होते हैं उतने कृष्ण की बातें होती हैं और जितनी बातें होती हैं उतने तरीके से बुद्धि सोचती है जब दिमाग बुद्धि स्थिर होकर एक जगह या परमात्मा में लग जाती है तो उसे ही लोग कहते हैं बुद्धि का खेल हो जाना ही एकाग्रता यानी कंसंट्रेशन कहलाता है दोस्तों शेर होकर एकाग्रता से कुछ करने को सामाजिक स्थिति भी कहते हैं और अगर आपने कंस्टनटेशन से काम किया हुआ हो तो मैं दावे के साथ कहता हूं कि वो काम कभी भी व्यर्थ नहीं होगा

 


भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 54 में क्या कहा गया है

54.

अर्जुन पूछते हैं हे केशव समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए फिर बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है दोस्तों आप जरूर जानना चाहेंगे कि जो लोग अपनी अपनी फील्ड में सबसे ऊपर पहुंचते हैं उनकी सफलता का रहस्य क्या है अर्जुन भी जानना चाहता है कि जो शेर होकर अपनी बुद्धि को एक जगह लगा देते हैं उनकी पहचान क्या है

 


भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 55 में क्या कहा गया है

55.

श्री भगवान उत्तर देते हैं यह अर्जुन जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है भगवान कृष्ण ने बताया था कि आत्मा ही सबसे बड़ी सच्चाई है इच्छा या काम ना छोड़ना ही आत्मा के पास आना है जिसको संतुष्टि शांति के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता वही अपनी कामना को त्याग सकता है दोस्तों सोचिए क्या आपको अपनी खुशी अपनी शांति के लिए किसी और की आवश्यकता पड़ सकती है

 

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भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 56 में क्या कहा गया है

56.

बुरा होने पर जिसके मन में दुख पैदा ना हो अच्छा होने पर जो मन भी शांत रहे खुशी से पागल ना हो वह सादर या प्रेम तो सब कुछ एक ही भाव से एक ही जैसे देखता हूं उसकी बुद्धि स्थिर रहती है और वही मुनि या योगी कहलाता है अच्छी खबर में खुश हो जाला खुदा यह तो स्वाभाविक ही है अगर किसी जानवर को भी आप कुछ खाने को देंगे तो वह खुश होगा छीन लेंगे तो उसे बुरा लगेगा लेकिन इन सब से जो ऊपर उठ जाता है अलग-अलग अवस्थाओं में भी वह अपनी स्वयं की हालत नहीं बदलता मतलब उसकी बुद्धि स्थिर है या ने वह मुनि है वह योगी कहलाने के लायक है

 

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भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 57 में क्या कहा गया है

57.

जिसमें लगाव नहीं है शुभ हो या अशुभ अच्छा या बुरा जो दोनों को एक जैसे दिखता है वही अपनी बुद्धि को स्थिर रखता है इस श्लोक में कृष्ण समझा रहे हैं कि किस तरह से अलग-अलग हालत में खुद को अपनी बुद्धि को रखा जाए कैसे संयम और धैर्य से हम अपने जीवन में अनुशासन ला सकते हैं वरना चारों तरफ या तो दुख की हाहाकार होगी यह खुशी से लोग झूम रहे होंगे

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 58 में क्या कहा गया है

58.

कछुआ जिस ­तरह से सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है वैसे ही जब पुरुष इंद्रियों के ­विषयों से इंद्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है यानी दुनिया में रहकर भी दुनियादारी से बचना ही बुद्धि को शेयर करना है अगर किसी के सामने आप बहुत ही स्वादिष्ट खाना रखें तो क्या वह खुद को रोक पाएगा किसी के सामने आप महंगे आभूषण या डिजिटल ग्रेजुएशन रखें तो क्या वह स्वयं पर कंट्रोल कर सकेगा यह संभव नहीं है दोस्तों इस को संभव कर दे उसी की बुद्धि होती है आप स्वयं पर आजमा के देख दुनिया की वस्तुएं आप को लुभा नहीं पाती तो आप अपनी बुद्धि को नियंत्रण में ले आएंगे

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