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gita updesh in hindi
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भगवद गीता gita updesh in hindi हिन्दू धर्म का सबसे पवित्र ग्रन्थ माना जाता है महाभारत काल में रचे गये इस ग्रन्थ को gita updesh in hindi

 

और इस पोस्ट में हम यह जाने गे की श्री कृष्ण अध्धाय 2 के श्लक 59 से 71 तक क्या कहा है gita updesh in hindi

 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 59 में क्या कहा गया है 

59.

संभव है कि हम दुनिया के विषयों में रुचि ना लें इससे हम दुनिया से दूर तो हो जाएंगे लेकिन दुनिया के प्रति उनकी आसक्ति नहीं जाती कहने का मतलब है कि मन की इच्छा को खत्म करना है आसक्ति खत्म करनी है अगर ऐसा करना है तो युधिष्ठिर होगी कृष्ण कह रहे हैं कि मान लीजिए आप दुनिया की वस्तुओं को ना भी बोल देते हैं तो क्या आपका मन उसी में लगा हुआ है आसक्ति इच्छा खत्म करनी है तभी तो वह खत्म होगा मन के लगाव को ही लोग कहते हैं gita updesh in hindi

 

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भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 60 में क्या कहा गया है 

60.

 

श्री अर्जुन आ शक्ति का नास ना होने के कारण यह प्रबन्धन स्वभाव वाली इंद्रियां प्रयास करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती कृष्ण समझा रहे हैं जहां आप अपनी इच्छा या अपनी आ सकती खत्म नहीं करते वहां इंद्रियां आपको अपने बस में कर लेती हैं सोचिए कितनी बार ऐसा होता है कि सुख दुख आपके बस में नहीं आप सुख-दुख के वश में हो जाते हैं कभी हंसी नहीं होती तो कभी रोना नहीं कभी भूख नहीं रुकती तो कभी नीद नहीं और कभी कामवासना भी नहीं रुकती  gita updesh in hindi

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 61 में क्या कहा गया है 

61.

 

इंद्रियों को वश में करके भगवान को ध्यान में रख जो बैठता है अपने कर अपने कर्तव्य में जो ध्यान लगाता है उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है वह ईश्वर अपने लक्ष्य के समीप हो जाता है दोस्तों अगली बार आप कुछ भी करें ना तो यह देखिएगा कि वह काम आप की इंद्रियां आप से करवा रही हैं या आपका कर्म वो करवा रहा है आपको दे समझ जाएंगे कि श्री कृष्ण क्या कहना चाहते हैं इंद्रियों के वश में ना होकर उन्हें अपने वश में करने पर ही आप अपनी बुद्धि को स्थिर कर पाएंगे  gita updesh in hindi


भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 62में क्या कहा गया है  

62.

विषयों के बारे में अर्थात इच्छाओं के बारे में सोचते रहने से उसमें क्रोध आ सकती हो जाती है पराशक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और जब वह कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है जिस तरह ज्यादा खाने से भूख बढ़ती है ज्यादा सोने से नींद बढ़ती है उसी तरह से जवाब अपनी इच्छाओं के बारे में सोचते रहते हैं तो बस उसी में हंस के रह जाते हैं और उसे ही आ सकती कहते हैं आसक्ति के बढ़ने को कामना कहते हैं और कामना के पूरा ना होने पर गुस्सा आता है और तब आप अपनी समझ को देते हैं


भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 63में क्या कहा गया है  

63.

यानी सोचने की शक्ति कम हो जाती है मोड भाव से पृथ्वी में भ्रम हो जाता है जब सोच नहीं सकते तो याद भी नहीं रख सकते पृथ्वी में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है जब याद नहीं रख पाएंगे तो ज्ञान किसी काम नहीं आएगा बुद्धि बेकार हो जाएगी और बुद्धि का नाश हो जाने से पुरुष अपनी स्थिति से घिर जाता है

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 64 में क्या कहा गया है 

64.

जो अपनी इच्छाओं को अपनी आंख शक्तियों को अपने नियंत्रण अर्थात कंट्रोल में रख पाते हैं दोस्ती शत्रुता गुस्से यह प्यार के बिना अपनी इंद्रियों को भटकने नहीं देते वह अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं ऐसे लोगों को बाहर ही नहीं हार्दिक और अंदरूनी प्रसन्नता होती है आनंद खुशी शांति कहीं बाहर नहीं होती दोस्तों वह तो हमारे अंदर होती है और हम उसे ढूंढते बाहर हैं इसलिए ऐसा कहा गया है कि मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास

 

 भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 65 में क्या कहा गया है 

65.

अंतः करण की प्रसन्नता होने पर अंदर से प्रसन्न होने पर दुख खत्म हो जाते हैं और ऐसे प्रश्न नक्षत्र कर्म योगी की बुद्धि शीघ्र ही सबौर से हटकर एक परमात्मा में ही भली भांति स्थिर हो जाती है दोस्तों आप अपने लक्ष्य के बारे में सोचिए प्रयास करिए कि उसे सबसे अच्छा पूरी दुनिया में दीप बेस्ट सबसे बेस्ट हूं चेक कैसे कर सकते हैं और उसे पूरा करने में लग जाइए हल्का मत सोचिए कि लक्ष्य पूरा होगा कि नहीं बस उसे करते रहिए और फिर देखिए कैसी मानसिक शांति और सुकून मिलता है आपको

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 66 में क्या कहा गया है 

66.

जो पुरुष अपने मन की अपनी इंद्रियों को नहीं जीत पाते उन्हें नीचे आदमी का बुद्धि नहीं होती यानी कि वह स्पष्ट और सटीक निर्णय नहीं ले पाते ऐसे मनुष्य के अंतः करण में भावना भी नहीं होती भावना ही मनुष्य को शांति नहीं मिलती और शांति रहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है बीमार आदमी क्या अच्छा खाना और क्या बुरा था उसे कुछ अच्छा नहीं लगता जो अंदर होता है वह बाहर आता ही है जब आपके अंदर शांति नहीं होगी तो आप आनंद कभी भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे

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भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 67 में क्या कहा गया है 

67.

जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु कर लेती है जैसे हवा पानी में चलती हुई नाव की दिशा बदल देती है वैसे ही विश्व में भी चलती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है वह एक ही केंद्रीय संयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है अगर वह क्रोध में है तो और कुछ भी नहीं सोच पाए गा और अगर प्रेम में है तो उसे किसी बात की सोच भी नहीं रहेगी जिस भी इंद्रियों के बस में होगा उसे उसके अलावा कुछ भी समझ नहीं आएगा इन इंद्रियों के नियंत्रण से निकलकर इनको आपके नियंत्रण में रखिए दोस्तों 

फिर देखिए आपके लिए क्या चल रहा है सब कुछ संभव हो जाएगा

 

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भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 68 में क्या कहा गया है 

68.

हे महाबाहु जिस पुरुष की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई है उसी की बुद्धि स्थिर है यानी जिस पुरुष ने अपनी इंद्रियों और उनसे होने वाली इच्छाओं पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है उसी की बुद्धि स्थिर है और बुद्धि हमारा ध्यान ऐसी ऐसी जगह पर ले जाती है जहां पर हम उलज के अपना असली मकसद भूल जाते हैं बुद्धि सहारा लेती है हमारी इंद्रियों किस लिए घरगुती पर विजय प्राप्त कर दी है दोस्तों तो इंद्रियों को वश में करना होगा 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 69 में क्या कहा गया है 

69.

 

संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है उस नित्य ज्ञान स्वरूप परमानंद की प्राप्ति में क्षेत्र प्राज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्व को जानने वाले होने के लिए वह रात्रि के समान है दोस्तों कृष्ण की के बाद गहरी है और समझने पड़ेगी जो सबके लिए रात है उस रात में योगी परमात्मा के लिए ज्ञान के लिए जागता है और साधना करता है और जो सबके लिए सांसारिक सुख है जिसके लिए संसार में हर कोई जानता है वह सुख योगी के लिए रात के समान है जब सब सोते हैं तो मेहंदी बच्चा रात में जाग के पड़ता है और परीक्षा में वही अव्वकल आता है

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 70 में क्या कहा गया है 

70.

 

जैसे नाना प्रकार की नदियों के जल शब्दों से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित ना करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब लोग जिस क्षेत्र में पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना समा जाते हैं वहीं पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है लोगों को चाहने वाला नहीं नदिया समुद्र को विचलित अर्थात उसे डिस्टर्ब नहीं करती उसी तरह से स्थिर बुद्धि वाले पुरुष में सारी इच्छाएं सारे भोग समा जाते हैं और उसे विचलित नहीं करते कई बार किसी के कहने पर आपको बुरा लगता है और आप अपना आपा खो देते हैं इसका मतलब आपका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है ऐसा समुद्र बनी है जिसमें कोई भी नदी किसी भी तरह की गाली या कोई कमेंट आपको कभी भी विचलित न कर पाए gita updesh in hindi 

 

भगवद गीता सार में अध्धाय 2 के श्लोक 71 में क्या कहा गया है 

71.

 

जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममता रहित अहंकार रहित और प्रसारित हुआ बिछड़ता है वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात और शांति को प्राप्त है कामना का इच्छा का त्याग करना है उससे मुंह नहीं रखना है घमंड नहीं करना है दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग रहना है ऐसे ही इंसान को शांति प्राप्त होती है कामयाब वही होता है जो परेशान हुए बिना अपनी धुन में अपने काम में लगा रहता है सफलता उसी के ही पाव चूमती है gita updesh in hindi


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